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15
Jun
10

एक किस्सा

तो बचपन का एक किस्सा ऐसे ही याद आ गया, सोचा बाँट लिया जाये | तो किस्सा है एक पंडित जी का, जो रोज कृष्ण भगवान् की मूर्ती पूजा करते थे | वह मूर्ती नहीं एक पत्थर होता है, गोलाकार सा | एक बार पंडित जी को कहीं कई दिनों के लिए जाना पड़ गया तो पूजा अर्चना की जिम्मेदारी उन्होंने अपने चेले को दे दी | अब उस पत्थर की सफाई करते करते हाथ से छूटा और कहीं गुम गया | चेला परेशान की पंडित जी को पता चला तो बहुत नाराज़ होंगे | उसने चुपके से एक जामुन रख दिया भगवान् जी की जगह | चूंकि असली पत्थर देखने में जामुन जैसा ही था तो पंडित जी को पता न चला और वापिस आने के बाद वो तो रोज ठाकुर जी समझ के जामुन की पूजा करते थे |

पर बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाएगी. जामुन सड़ गया | पंडित जी ने जब चेले से पूछा की ये कैसे हो गया | तो चेले ने ये कुछ पंक्तियाँ जड़ दीं:

पुनि पुनि चन्दन, पुनि पुनि पानी
ठाकुर जी सड़ गए हम का जानी

06
Feb
10

दास्ताँ “जो” और “गन्ना” की

Based on true experiences. People who know me from 2001-05 should be able to relate with this story, including the characters in the story. People who don’t know me and can’t relate it may ignore this as a rambling hand on a keyboard.

दूर गाँव एक बस्ती थी जहां technology बहुत ही सस्ती थी | ये बात है साधूनगर नामक एक गाँव की जहां एक अनाथालय स्थापित किया गया | जिस मारवाड़ी सेठ के नाम पे अनाथालय बनाया गया लोग उसके गुण गान करते और ढेर सारी technology पड़ा करते थे | शुरुआत के पांच भगवानों से तो अब कई भगवान् हो चुके थे | सारे भगवान् मिल कर नहीं तो आपस में अपने देवत्व में चूर होकर बच्चों को ढेर सारा ज्ञान और बहुत सारी technology देते थे | और बच्चे भी मन के सच्चे, खूब जोर लगा के नहीं पड़ते थे , पास में bioscope वाले भैय्या के यहाँ दिन गुजारते और एक छोटे से डब्बे में धमा चौकड़ी करते | काम देव के ऐसे कृपा बाण चले और सूखी सेहरा में कहीं से सोमरस का ऐसा झरना फूटा की पूरा आलम मद में सराबोर हो मादक हो चला | यूं समझिये की हर दिन vallentine और हर रात Ballentine | चचा ग़ालिब तो गलत थे जो कहते “इश्क ने ‘ग़ालिब’निकम्मा कर दिया,वरना हम भी आदमी थे काम के” | अजी ख़ाक डालिए ग़ालिब को यहाँ तो उलटी कहावत हो गयी “इश्क ने कर दिया कामगार ‘कायल’, जब आशिक ने लगा दिया काम पे” | प्रेमी युगल मिलके और जुलके दिन रात पड़ी करते और अव्वल दर्जे से पास होते |

तो उन कई भगवानों में से एक थे जिनका नाम था “नंग धडंग जोकर”, हम इस किस्से में उसे “जो” पुकारेंगे | तो ये है जोकर, मतलब “जो” का एक वाक्या श्रीमान गन्ना के साथ | गन्ना तो अराजकता का प्रतीक था और “जो” तो control freak था | जो खाने और न पीने का भगवान् था और जनता खाने से त्रस्त थी | पराठे तो बगल के चार रास्ता के हवालदार से भी कड़क , मानो खाने के लिए नहीं Judo Karate की practice के लिए बनाये गए हैं | जो आंकड़े लड़ाने में उस्ताद था, जब पैदा हुआ था तब nurse ने ये थोड़े बोला था की लड़का पैदा हुआ है, nurse ने उस ही समय घोषित कर दिया की चलता फिरता कंप्यूटर पैदा हुआ है | खैर जब श्रीमान गन्ना पहुंचे शिकायत करने तो जो ने भारी भरकम शब्दों की एक लड़ी लगा दी | और जब पत्थर नुमा पराठे दिखाए गए तो थोडा दंग तो हुआ पर लड़ी रुकी नहीं |

गन्ना ने बीच में कुछ बोला तो जो ने उसे झड़प दिया | जब जो ने पेट भर के अल्फाजों की उलटी कर ली तो फिर चैन की सांस लेते हुए गन्ना को बोलने को बोला | पर गन्ना चुप और मना कर दिया | जो बौखला गया और कहा तुम कुछ बोल रहे थे अब बोलते क्यूँ नहीं | गन्ना ने दो टूक सा जवाब दिया – आपको मेरे बोलने पे अधिकार है चुप्पी पे नहीं और वहाँ से चल दिया |




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