07
Feb
10

Kyunki har email id kuchh kehta hai

Har email id khaas hai kyunki har email id kuchh kehta hai:

06
Feb
10

दास्ताँ “जो” और “गन्ना” की

Based on true experiences. People who know me from 2001-05 should be able to relate with this story, including the characters in the story. People who don’t know me and can’t relate it may ignore this as a rambling hand on a keyboard.

दूर गाँव एक बस्ती थी जहां technology बहुत ही सस्ती थी | ये बात है साधूनगर नामक एक गाँव की जहां एक अनाथालय स्थापित किया गया | जिस मारवाड़ी सेठ के नाम पे अनाथालय बनाया गया लोग उसके गुण गान करते और ढेर सारी technology पड़ा करते थे | शुरुआत के पांच भगवानों से तो अब कई भगवान् हो चुके थे | सारे भगवान् मिल कर नहीं तो आपस में अपने देवत्व में चूर होकर बच्चों को ढेर सारा ज्ञान और बहुत सारी technology देते थे | और बच्चे भी मन के सच्चे, खूब जोर लगा के नहीं पड़ते थे , पास में bioscope वाले भैय्या के यहाँ दिन गुजारते और एक छोटे से डब्बे में धमा चौकड़ी करते | काम देव के ऐसे कृपा बाण चले और सूखी सेहरा में कहीं से सोमरस का ऐसा झरना फूटा की पूरा आलम मद में सराबोर हो मादक हो चला | यूं समझिये की हर दिन vallentine और हर रात Ballentine | चचा ग़ालिब तो गलत थे जो कहते “इश्क ने ‘ग़ालिब’निकम्मा कर दिया,वरना हम भी आदमी थे काम के” | अजी ख़ाक डालिए ग़ालिब को यहाँ तो उलटी कहावत हो गयी “इश्क ने कर दिया कामगार ‘कायल’, जब आशिक ने लगा दिया काम पे” | प्रेमी युगल मिलके और जुलके दिन रात पड़ी करते और अव्वल दर्जे से पास होते |

तो उन कई भगवानों में से एक थे जिनका नाम था “नंग धडंग जोकर”, हम इस किस्से में उसे “जो” पुकारेंगे | तो ये है जोकर, मतलब “जो” का एक वाक्या श्रीमान गन्ना के साथ | गन्ना तो अराजकता का प्रतीक था और “जो” तो control freak था | जो खाने और न पीने का भगवान् था और जनता खाने से त्रस्त थी | पराठे तो बगल के चार रास्ता के हवालदार से भी कड़क , मानो खाने के लिए नहीं Judo Karate की practice के लिए बनाये गए हैं | जो आंकड़े लड़ाने में उस्ताद था, जब पैदा हुआ था तब nurse ने ये थोड़े बोला था की लड़का पैदा हुआ है, nurse ने उस ही समय घोषित कर दिया की चलता फिरता कंप्यूटर पैदा हुआ है | खैर जब श्रीमान गन्ना पहुंचे शिकायत करने तो जो ने भारी भरकम शब्दों की एक लड़ी लगा दी | और जब पत्थर नुमा पराठे दिखाए गए तो थोडा दंग तो हुआ पर लड़ी रुकी नहीं |

गन्ना ने बीच में कुछ बोला तो जो ने उसे झड़प दिया | जब जो ने पेट भर के अल्फाजों की उलटी कर ली तो फिर चैन की सांस लेते हुए गन्ना को बोलने को बोला | पर गन्ना चुप और मना कर दिया | जो बौखला गया और कहा तुम कुछ बोल रहे थे अब बोलते क्यूँ नहीं | गन्ना ने दो टूक सा जवाब दिया – आपको मेरे बोलने पे अधिकार है चुप्पी पे नहीं और वहाँ से चल दिया |

06
Feb
10

जो कभी नहीं जाती वही है जाती

यूं तो जाती और वर्ण का अंग्रेजी अनुवाद करे तो एक ही शब्द आता है caste किन्तु दोनों में ज़मीन आसमान का अंतर है | इसका आभास तो पहले से ही था पर detail में m n srinivas की किताब “The Remembered Village” पढ़ के लगा | ये किताब लेखक के रामपुरा में बिताये गए अध्यन की आपबीती है जो बड़े ही सहज ढंग में लिखी गयी है | इसके कई हिस्से भारतीय पाठकों को सामान्य लगेंगे क्यूंकि वो भारतीय सभ्यता और तौर तरीकों से अवगत है पर कई हिस्से मुझे तो आश्चर्य जनक लगे |

पहले तो जहां वर्ण एक सरल सी categorization है जो भारत में करीबन हर जगह पायी जाती है पर जाती हर प्रांत में अलग अलग रहती है और कहीं ज्यादा dynamic है | चार वर्णों में एक linear order है जो कभी बदलता नहीं पर ऐसे example भी पेश किये जिससे दिखाई देता है की वर्ण system नाम मात्र है | वर्णों के हिसाब से शूद्र चौथे दर्जे में आते हैं जो अछूतों से ऊपर माने जाते हैं, पर local context में शूद्र एक broad category है जिसमे किसान तक आते हैं (जो कई जगह क्षत्रीय भी माने जाते हैं) | ऐसे कई example हैं को दर्शाते हैं की local level पे वर्ण system के कोई मायने नहीं है|

कई लोगों में और खासकर पढ़े लिखे, शहर के modern ख्याल के लोगों में एक नजरिया पाया जाता है की जाती का system पिछड़ापन दिखाता है | इसमें कोई दोराय नहीं है की जात पात के चक्कर में खून खराबे हुए हैं | ऐसे मसलों को हल करने के लिए जो political system हमने बनाया है उससे आज तक तो शायद ही कोई लाभ हुआ हो | उल्टा vote bank जैसे शब्द पनप चुके हैं जो जातिवाद को और बढावा देते हैं | क्या आपसी मतभेद सुलझाने के कोई और रास्ते नहीं हैं? इन ही सब बातों के बारे में सोचने पे मजबूर किया इस किताब के एक हिस्से में जहां लेखक ने बताया की कैसे नीची कहलाई जाने वाली लोहार जाती ने खुद का दर्जा ऊंचा किया तमाम ज़रियों से| दूसरी जातियों ने तमाम अडचने पैदा करी पर धीरे धीरे उनका ओहदा बड़ा|

और भी उद्हारण दिए गए हैं जिनमे जातीयों में मतभेद रहा तो उन्होंने आपस में जैसे तैसे लड़ झगड़ के, बात चीत करके, तौर तरीके बदल के सुलझा लिए, कहीं भी वहाँ के MLA, MP का कोई ज़िक्र नहीं आता | सिर्फ जाती नहीं और भी कई मुद्दे ऐसे ही गाँव के अन्दर ही सुलझाये जाते, लोगों को राज्य की राजधानी, दिल्ली या media का कोई सहारा नहीं लेना पड़ा |

ये सब देख के लगता है की गाँधी का बताया हुआ पंचायत राज्य ही भारत के लिए उचित है, हर गाँव एक राज्य है, हर घर एक प्रयोगशाला, हर इंसान एक वैज्ञानिक, आखिरकार गाँधी के बनाये हुए आश्रम एक laboratory नहीं थे तो और क्या थे | जहां इतने लोग, इतनी बोली, मान्यताएं रखते हैं और जिनकी अपनी अपनी ज़रूरते हैं वहाँ एक central body कैसे सबके लिए निर्णय ले सकती है | लोगों को ज्यादा से ज्यादा autonomy मिलनी चाहिए | हाँ नेहरूवादी ज़रूर कहेंगे की इससे देश की आंतरिक सुरक्षा को खतरा है और देश टूट जायेगा (ये तर्क आन्ध्र प्रदेश विभाजन में भी उठाया गया था) पर ये डर उस समय का है जब देश नया नया बना था और पूरा भी नहीं था |

अब भारत की एकता को बाहर से ज्यादा अन्दर से खतरा है | नक्सलबारी कम होती दिख नहीं रही, महाराष्ट्रे में शिव सेना और राज ठाकरे जैसे cartoon(ist) समाज का व्यंग्य चित्र उभार के दिखा रहे हैं, वामपंथी (leftist) ने बंगाल में अपना रंग दिखा ही दिया, कश्मीरी लोग खुद को भारतीय नहीं मानते, हर थोड़े दिन में आरक्षण को लेकर कहीं न कहीं बवाल होता रहता है | और भारतीय मीडिया एक पागल आदमी सामान एक ही चीज़ चिल्लाता रहता है जिससे public discussion का बंटा धार हो चुका है|

शायद स्वदेस के ईसर काका सही ही कहते थे – जो कभी नहीं जाती वही है जाती
मेरे अनुसार तो जाती नहीं जानी चाहिए, वर्ण जाने चाहिए और जाती पे होने वाले ढोंग का अंत होना चाहिए| सिर्फ ये कह देने से की “जाती चीज़ ही खराब है और वो गायब हो जानी चाहिए” से कोई मसला हल नहीं होगा | हम जातियों को नकार के भी नहीं रह सकते और western secular democracy भी काम नहीं आती है |

31
Jan
10

Graphical Pyaar

Now we have seen whole lotta perspectives of love in Hindi cinema lyrics on this blog. So in that spirit try to decode the lyrics:

Prize: Sunny Paji ke dumb-bells
Note: Comments have been moderated so all comments with announcement of prize would be disclosed after a day.

Here’s the MATLAB code for the same.

x = [0:0.01:(pi/2)-0.01];
y = 1 + tan(x)+2*x;
plot(x,y,’blue’,x,13,’red’);
ylabel(‘Pyaar –>’,'FontWeight’,'bold’);
xlabel(‘Time –>’,'FontWeight’,'bold’);
title(‘Graph-ical Pyaar!’,'FontWeight’,'bold’);
set(gca, ‘XTick’,[0:0], ‘XTickLabel’,[]);
set(gca, ‘YTick’,[0:0], ‘XTickLabel’,[]);
a=1.47;
text(a, 1 + tan(a)+2*a, ‘Limit’,'HorizontalAlignment’,'right’,'VerticalAlignment’,'bottom’);

29
Jan
10

Bulla joins open source community

Guess who just joined OPEN SOURCE community:

Thanks: GreatBong
My original tweet.

28
Jan
10

Gizmo-garh ke Bholey

Click to enlarge the image.

28
Jan
10

FB Stats

Get a sneak peek at my Facebook live feed and how it appears to me.

Diss-claimer: All names & faces have been transmogrified not to prevent identification because they deserve so. If you are in my friend list go figure.

28
Jan
10

Hey Johnny

Johnny Gaddar, zindagi jua hai khel yaar

Note: The entire image is generated from Matlab code (except the background fill). If enough people are interested I can post the code too.

27
Jan
10

Deepika 2.0 Ji

New age Deepika 2.0 Ji has arrived to give offer her “Paarkhi Nazar” on Apple iPad.

27
Jan
10

inspiration

Fill in the blanks to find the cheap inspiration of an old comedy. Those arrows indicate another actor in corresponding role.

Prize: Sixteen interesting buttons.

26
Jan
10

नाम में क्या रखा है

अब मियाँ Shakespeare तो कह के टपक गए की “नाम में क्या रखा है“, खैर वो तो चीज़ों की अंदरूनी रूप के बारे में कह रहे थे की उनका नाम से कोई लेना देना नहीं है, किन्तु नामों का कुछ तो महत्त्व है | यदि शोले में डाकू का नाम गब्बर न रख के चम्पक भूमिया रखा जाता तो क्या आप उसके “ताप” से थर्राते ? या मुगैम्बो मुगैम्बो न हो कर यदि घंटाप्रसाद कहलाता तो क्या आप खुश होते?

तो नामों की बात से ही याद आया की बात है उस समय की जब हम पढाई-लिखाई पूरी करके निकले जॉब करने | भाई बबुआ जब बाबू बने तो बाबू लोगों के तौर तरीके भी आने चाहिए | Professional जगत में कैसे उठाना बैठना है ये भी पता होना चाहिए और नए नए लोगों से भी मिलना चाहिए जिसे networking कहते हैं | तो जॉब के शुरुआत के दिनों में सब नए नए रंगरूट (recruit) एक दूसरे से मिलते, तो हम को एक बंगाली बाबूमोशाय मिले | मिले तो मिले और झट से अपना हाथ आगे बड़ा के कड़क आवाज़ में बोले स्वागतम| हमें लगा वाह ये हाई, हल्लो की दुनिया छोड़ के कोई ultra देसी मिला है | हमने भी हाथ आगे बड़ा के हाथ से हाथ मिलाया और कड़क आवाज़ में जड़ दिया स्वागतम |

मज़े की बात हुई की बाबूमोशाय झेंप के बोले “दरअसल मेरा नाम स्वागतम है” | हसी की पटाखे तो खूब छूटे पर कहीं Shakespeare जनाब मिल जाये तो उन्हें स्वागतम से स्वागतम कराया जाये और पूछे क्यूँ चचा नाम में कुछ नहीं रखा?

26
Jan
10

किसका सुर और कैसे मिले?

इस गणतंत्र दिवस पे पता चला की भारतवर्ष का चहेता गाना “मिले सुर मेरा तुम्हारा” दोहराया गया है एक नए ढंग से “फिर मिले सुर मेरा तुम्हारा” (पहला हिस्सा, दूसरा हिस्सा ) | सुन कर अच्छा लगा, नयी सदी के नए दशक में क्यूँ न एकता में सारा समाज (समाज न की राष्ट्र-राज्य अर्थात nation-state) एक नए ढंग से सुर में सुर मिलाये , आखिर हर पीढी हर पौराणिक (mythology) वस्तु को अपने ढंग से दोहराती है और इस ही दोहराने, भूलने और याद रखने से ही ऐसी स्मृतियाँ जीवित रहती हैं | पर यह देख कर तनिक निराशा हुई की ये किसके सुर मिल रहे हैं और कैसे मिल रहे हैं|

जहां की पहले गाने में देश की जानी मानी हस्तियाँ तो थीं पर ऐसा नहीं लग रहा था की सिर्फ वही हैं इस देश में | नए गाने में सिर्फ हस्तियाँ वो भी ज्यादातर फ़िल्मी सितारे दिखाई दे रहे हैं | जहां पिछले गाने में हर प्रांत के , हर भाषा के सुर में वहाँ की मिटटी की खुशबू आती थी वहीं नए गाने में वो बात नज़र नहीं आ रही | और इन सब खुशबुओं का सम्मलेन किस सौंदर्य से होता है वो न सिर्फ दिखाई देता था पर सुनाई भी देता था | हस्तियों से कोई परहेज़ नहीं है लोग उनको जानते, पहचानते और मानते हैं पर उनका कोई स्थान तो होना चाहिए, बहुतों को बिना किसी सन्दर्भ (context) के ठूंस दिया गया है |

मैं कोई महान संगीतग्य तो नहीं की दोनों गानों के सुर लय और ताल की व्याख्या करूं और critical remarks दूं पर इतना ज़रूर लगता है जब पुराना गाना तेज पकड़ता है तो मन हर्षोल्लास से भर जाता है | जहां पुराने का आग़ाज़ पंडित भीम सेन जोशी से होता है वहीं अमिताभ बच्चन की आवाज़ मुझे तो न भाई, दीपिका पदुकोण वाला हिस्सा तनिक भी न भाता | शास्त्रीय संगीत तो अच्छा चुना है पर लोक संगीत में वो मिठास नहीं आती | कुछ कुछ हिस्से तो बहुत बेकार लगे जैसे श्यामक डावर, शाहिद कपूर और रणबीर कपूर के | शंकर एहसान और लॉय के सुरों में गिटार बहुत अजीब सा लगता है | पंजाब के सुर में तो पुराने गाने का कोई जवाब नहीं है |

ऐसे विश्लेषण का कोई अंत नहीं है पर कुल मिलाकर देखा जाये तो लगता है सुर तो हैं, थोड़े अछे, थोड़े कम अछे पर उनका मिलन कुछ ख़ास न हुआ, समागम कम और कलह ज्यादा | वो अंग्रेजी में कहते हैं न – sum is more than its parts वो आभास न हुआ

19
Jan
10

A A B

Decode the movie name depicted here and get Mithun Da’s 80s Disco gear.

19
Jan
10

SRK, Shilpa and …

Lyrics of which song are depicted in this photo, answer this to win Jaani’s muffler.

[Pretty easy one I say]

19
Jan
10

Ye pyaar hai ki …

Find which movie lyrics I am talking of and win Anil Kapoor’s Razor Blade.

17
Jan
10

Tang, Mang and Dil

“मांग वो मांग के जिस मांग ने दिल मांग लिया, टांग वो टांग के जिस टांग ने दिल टांग दिया, तो बताओ मेरी पगार कितनी हुई”

Maang wo mang ke jis maang ne dil mang liya, Taang wo tang ke jis taang ne dil tang diya, to batao meri pagar kitni hui?

Which actor in which movie poses this question?

Prize: Raj Kumar’s Wig

14
Jan
10

The Thirsty Crow

The famous fable with an anti-climax and a winner for Darwin Awards.

14
Jan
10

Pyar Ke Perspective

14
Jan
10

Kaka’s Konklusions

14
Jan
10

Kaka’s Zentastic Derivation




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Random Ramblings Of the Passt

February 2010
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